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हिमालय में जलविद्युत के लिए सुरंगें - आदमी और मशीन के लिए चुनौती


जलविद्युत उत्पादन के लिए शक्तिशाली हिमालयी नदी को सुरंगों से नहर बनाकर लाना न केवल भू-गर्भीय कठिनाईयों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए दृढ़ संकल्पता से किया गया साहसिक इंजनियरिंग कार्य है अपितु इस कार्य को पूर्ण् करने के लिए नए समाधानों हेतु तीक्षण बुद्धि की आवश्यकता होती है। 

लाखों वर्ष पहले ज्वालामुखी के लावे से कठोर चट्टानों में परिवर्तित हिमालय की चुनौतीपूर्ण कठोर चट्टानों को एक-एक इंच काटकर किलोमीटरों में सुंग का निर्माण करने के लिए उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग तथा लगन से कार्य करने की आवश्यकता होती है।

भारत के उत्तर में रामपुर जलविद्युत परियोजना में 412 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता वाला संयंत्र लगाने के लिए सतलुज नदी पर 1500 मेगावाट के नाथपा झाकड़ी संयंत्र के अपस्ट्रीम से बिना कोई बांध बनाए 15.177 कि.मी. लंबी तथा 10.5 मीटर व्यास वाली सुंग से पानी को ले जाया जाएगा। यह एक ऐसी इंजीनियरिंग उपलब्धि है जिससे मानवता को स्वच्छ विद्युत प्राप्त होगी। पहाड़ों से जूझते 35 वर्षीय कामगार जगमोहन रावत ऐसी बड़ी सुरंगों के निर्माण के जरूरी महान कोशिशों को इस प्रकार बयां करते हैं " दिनों, महीनों और वर्षों से इस सुंग में कठोर चट्टानों में कार्य करते हुए थकान हो जाती है। परंतु फिर भी हमेशा अंदर यह उत्सुकता रहती है कि किसी दिन इस सुंग में दूसरी ओर प्रकाश अवश्य नजर आएगा । "

पहाड़ों के अंदर गहराई में भी हार न मानने वाले, गिरती हुई चट्टानों के बीच काम करने वाले, चट्टानों से रिसते गर्म (झाकड़ी परियोजना में बधाल नामक स्थान पर ±60º) एवं ठण्डे पानी से न डरने वाले तथा चट्टानों में किए गए विस्फोट से उठने वाले धूल के बादलों के बीच काम करने वाले जगमोहन का केवल यही कहना है कि " यह कार्य एक नशे के समान है। जैसे-जैसे सुरंग बनती जाती है इसे पूर्ण करने की इच्छा भी बढ़ती जाती है । "

सुरंग के नाजुक भाग में नेपाल के कुमार लामा, बंगाल के कांजू, बिहार के गुड्डा कुमार और झारखण्ड के सुरेन्द्र कुमार के साथ दिन की शिफ्ट में काम करने वाले उत्तराखण्ड के जगमोहन का कहना है कि " जो पहाड़ों के अंदर जाकर कार्य करते हैं वह एक पखवाड़े तक दिन की रोशनी नहीं देख पाते और वे अस्थाई तौर पर समय की समझ गवां देते हैं । "

48-50 डिग्री सेल्सियस गर्म व आर्द्रता वाले तापमान वाली परिस्थितियां व्यक्ति और मशीन के धैर्य की परीक्षा लेती हैं।  ऐसे क्षेत्र में कार्य करने के लिए ठंडक और ताजी हवा के लिए बड़े ब्लोअर का लगातार चलना आवश्यक है। ड्रिलींग के लिए पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी है। यदि वहां पर विद्युत या पानी की आपूर्ति बंद हो जाए तो सुरंग में रहना दूभर हो जाता है।

दो वर्षों से सुरंग में कठोर परिश्रम करने वाले कुमार लामा का कहना है कि " हम ताजा हवा के लिए तरस जाते हैं और यहां पर सदैव चारों तरफ चट्टानों के खिसकने का डर बना रहता है। यहां पर सुरक्षा के इंतजाम बहुत उच्च स्तर के हैं और मेरे आस-पास कभी भी कोई कामगार घायल नहीं हुआ। "

सुरंग निर्माण के लिए 8फरवरी,2011 को एक खास दिन था। एसजेवीएन के उच्च अधिकारी सुरंग के दो हिस्सों के दरम्यान आखरी ब्लास्ट संपन्न करने हेतु सुरंग के एक भाग पर एकत्रित हुए। इस नियंत्रित  ब्लास्ट के जरिए आखरी चट्टानी पर्त खुल गई तथा काजो एडिट की अपस्ट्रीम का एक हिस्सा बाएंं किनारे के डाऊîनस्ट्रीम वाले हिस्से से जुड़ गया । इस मौके पर प्रबन्धकों एवं कामगारों ने मिलकर जश्न मनाया।

परियोजना प्रमुख याद करते हैं कि वह एक जश्न का दिन था। सुरंग का सतत 7.7 कि.मी. हिस्सा पूरा कर लिया गया था। वे कहते हैं कि यहां तक पहुंचने के लिए निर्माणपरक अन्वेषण, डिजाइनिंग एवं सटीकता में बहुत मेहनत लगी।

सख्त चट्टानों को हटाने के लिए भारी विस्फोटकों के उपयोग का झूठलाते हुए वे कहते हैं कि आधुनिक हाइड्रो सुरंग की तकनीकें बेहद नियंत्रित  सिक्रोनाइज की गई ब्लास्टिंग पर आधारित होती हैं जो अधिकतम नतीजे देकर ईर्द-गिर्द के क्षेत्र में न्यूनतम शोर एवं कंपन पैदा करती हैं।

उत्कृष्ट अभियोजना एवं विस्तृत सर्वेक्षणों के बावजूद अप्रत्याशित भूगर्भीय घटनाएं निर्माण अनुसूचियों को सालों तक गड़बड़ा देती हैं और ऐसी बड़ी परियोजनाओं का वजूद ही खतरे में डाल देती हैं। 180 एल/सेक्श.-350 एल/सेक्श. में ठण्डे एवं गर्म पानी के प्रवाह का यह असर होता है कि काम की गति धीमी हो जाती है तथा आगे बढ़ने से पहले रिसते जल को निकालने के लिए ताजा अनावृत्त हुई चट्टानी सतह को सुखाने के लिए विशेष रसायनों का लेप करना पड़ता है। अपस्ट्रीम 1500 मेगावाट क्षमता वाले नाथपा झाकड़ी जलविद्युत स्टेशन की सुरंग के एक हिस्से में गर्म पानी आने से सुरंग के भीतर तापमान 65 डिग्री सेल्सियस की असहनीय हद तक पहुंच गया। इसके लिए बर्फ की एक खास फैक्टरी स्थापित करनी पड़ी ताकि बर्फ के ब्लाकों से तापमान कम किया जा सके जिससे कार्मिक काम कर सकें। रामपुर परियोजना की सुरंग के एक हिस्से में गर्म पानी निकला, परंतु अर्जित अनुभव के जरिए इसे हल किया गया हालांिक, इस बेहद महत्वपूर्ण सुरंग में अलग ही किस्म की मुश्किल पेश आई।

भूगर्भीय सर्वेक्षण में सुरंग के रास्ते में सख्त चट्टान (अनुकूल) तथा नर्म चट्टान (प्रतिकूल) के 65: 35 के अनुपात में होने की बात थी। काम में लगे इंजीनियरों ने एक हिस्से में प्रतिकूल चट्टानों का 20:80 (अनुकूलःप्रतिकूल) के अनुपात में सामना किया, जिससे इसका हल खोजने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी तथा लक्ष्य दूर होने लगे। सख्त चट्टानों में से सुरंग बनाना नर्म चट्टानों की तुलना में सरल होता है, क्योंिक सख्त चट्टान में किए गए छेद खुद अपने सहारे स्थिर रहते हैं लेकिन नर्म चट्टानों में किए गए छेदों को स्थिर रखने के लिए अतिरिक्त उपायों का सहारा लेना पड़ता है। परियोजना को वापस रास्ते पर लाने तथा प्रगति सुनिश्चित करने एवं बेहतर स्थायित्व हेतु यह उपाय किए गए कि प्रतिकूल चट्टानों वाले एक एडिट की लंबाई घटाई गई तथा पारंपरिक स्टील रिबों की जगह अधिक लचीली सहायक प्रणाली से युक्त लैटाइस गिर्डरों की तकनीक अंगीकृत की गई।

अतिरिक्त एडिट (सुरंग) की व्यवस्था किए जाने से काम शुरू करने के लिए दो और मुहाने उपलब्ध हो गए तथा परियोजना की कमीशनिंग लक्ष्य के अनुसार सितंबर,2013 तक सुनिश्चित करने के लिए परियोजना में अनुसूचित विलम्ब 2 साल कम हो गया। अतिरिक्त पहुंच एडिट (सुरंग) से जहां एक ओर अच्छे नतीजे सामने लाने लगे, वहीं इस हिस्से की पहाड़ी के काफी अंदर एक बहुत बड़ा छेद सामने आ जाने से इंजीनियरों एवं परियोजना के योजनाकारों के लिए फिर परीक्षा की घड़ी सामने आ गई।

सुरंग के रास्ते के समांतर चट्टानी संरचनाओं के अनुवीक्षणकर्त्ता एक परियोजना भू-वैज्ञानिक ऐसी छेद संरचनाओं के बनने को समझाते हुए बताते हैं कि " टेक्टोनिक हलचलों से कई बार चट्टान की एक पर्त दूसरी पर्त के अंदर मुड़ जाती है। इस प्रक्रिया में मुड़ी हुई चट्टान की पर्त कभी-कभी दो सख्त पर्तों के मध्य फंस जाती है। ऐसी पर्तों से होकर सुरंग निकालते समय नर्म चट्टानें गिर जाती हैं जिन्हें सुरंग अपनी गिरफ्त में नहीं रख पाती।

यह अड़चन एक इंजीनियरिंग चुनौती थी, जहां भारी मशीनरी नहीं लगाई जा सकती थी तथा नियंत्रित  ब्लास्टिंग से भी कोई मदद नहीं मिलनी थी।

इस हिस्से से होकर सुरंग निकालने की दो कोशिशे जब नाकाम हो गई तो छेद को चट्टानों एवं कंक्रीट से भरने का उपाय खोजने के लिए परामर्श्कों की सेवाएं ली गई, ताकि सुरंग संरचना टिकी रहे जिससे सुरंग निर्माण की गति कम न हो। छेद से होकर सुरंग निकालने के कारण अन्य चुनौतीपूर्ण फैसला छेद को बाइपास करने का था, ताकि सितंबर,2013 तक कमीशनिंग का काम पूरा हो सके। सुरंग के निर्माण का मल्टी ड्रिफ्ट का आजमाया हुआ तरीका इस्तेमाल किया गया तथा काम शुरू हो गया और इस छेदयुक्त मुश्किल हिस्से में सुरंग निर्माण के 25 मीटर के हिस्से को क्लीयर करने के लिए लगभग 15 महीने का समय लगा। अन्यत्र जहां अनुकूल चट्टानी हिस्सा था वहां एक माह 150-175 मीटर तक सुरंग का निर्माण द्रुत गति से हुआ।

जहां मुख्य फीडिंग सुरंग के निर्माण में आई मुश्किलों को धीरे-धीरे हल कर लिया गया, वहां 20 मीटर व्यास एवं 150 मीटर की वर्टिकल सर्ज शाफ्ट नामक सुरंग का काम अपेक्षतः सरल था तथा समय से पहले पूरा कर लिया गया। वर्टिकल सुरंग पर काम शुरू करने वाली टीम के सदस्य रहे हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के निवासी 52 वर्षीय रतिराम इस कार्य को पूरा करने के लिए वहां मौजूद रहने के प्रति गर्वान्वित हैं। काम के अपने शुरूआती दिनों को याद करते हुए कहते हैं " पायलट सुरंग में उतरना खतरे का काम समझा जाता था । जैसे-जैसे हम सुरंग में नीचे उतरते रहे वैसे-वैसे सह कामगारों की मित्रता गहरी होती गई जो एक यादगार अनुभव है। " सिरमौर के एक साथी कामगार 25 वषीय विक्रम भी कहते हैं " सुरंग में नीचे उतरना शुरू करने पर पहले डर जरूर लगा, पर किए गए सुरक्षा इन्तजामों से हमारा हौसला बढ़ गया । "

15.177 मीटर लंबी मुख्य सुरंग से होकर पानी सर्ज शाफ्ट से पेनस्टॉक सुरंगों नामक तीन छोटी सुरंगों से होकर गुजरता है। ये तीन पेनस्टाक सुंगें आगे बायल गांव स्थित सतही जनरेशन स्टेशन में स्थित 6 टरबाईनों में से होकर एक डिपेन्डेबल वर्ष में 1770 मिलियन यूनिट स्वच्छ विद्युत का उत्पादन करेगा।

मौसम बदलाव की मार झेल रही पृथ्वी की जरूरत स्वच्छ ऊîर्जा के इस्तेमाल की है, ताकि ग्लोबल वार्मिंग का असर कम हो। जलविद्युत ऊîर्जा उत्पादन के सबसे स्वच्छ तरीकों में से एक है तथा रामपुर परियोजना जैसी रन-आफ-दि-रिवर किस्म की परियोजनाएं यही कर रही हैं।

सुरंग निर्माण मानवीय प्रतिभा के प्रति एक ऐसा नमन है जो हिमालयी क्षेत्र में एक रन-आफ-दि-रिवर जलविद्युत परियोजना के निष्पादन का सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण एवं महत्वपूर्ण अंग है।

   

सर्वाधिकार सुरक्षित एसजेवीएन लिमिटेड